शिमला कालका रेल यात्रा
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27 अप्रैल 2013
सुबह सराहन में साढे पांच बजे उठा और अविलम्ब बैग उठाकर बस अड्डे की ओर चल
दिया। ती...
कान में उजबक की तरह नजर आते हमारे सितारे
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*डेस्क* ♦ कांस फिल्म फेस्टिवल में हमारे सितारे जैसी हरकतें कर रहे हैं,
उससे पता चलता है कि वे सच और सिनेमा का मिक्सचर हो चले हैं। टिप्पणीकार
उन्हें एक...
अब "मिस्टर क्लीन" तो नहीं रहे मनमोहन !
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आजाद भारत की ये पहली सरकार होगी जो इस कदर भ्रष्ट है। मनमोहन सिंह की अगुवाई
में सरकार का प्रदर्शन तो दो कौड़ी का रहा ही, संवैधानिक संस्थाओं को भी कमजोर
करने...
यह उपासक कौन है
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संग्रहालय में घूमते समय एक शिल्प दिखा, शिव और पार्वती अगल बगल बैठे हुए
हैं और किसी साधू या ऋषि को उनके सामने उलटे पाँव हाथ के बल खडे दर्शाया गया
था. उप...
संवाद और लेखन की प्रासंगिकता
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*हे मानवश्रेष्ठों*,
काफ़ी समय पहले एक* युवा* मित्र मानवश्रेष्ठ से *संवाद* स्थापित हुआ था जो
अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे स...
सपनों की दुनिया
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"मिलान में इतालवी वोग (Vogue) पत्रिका की नयी फोटो-प्रदर्शनी लगाने की तैयारी
हो रही है" के समाचार के साथ अंग्रेज़ी फोटोग्राफर *किर्स्टी मिशेल* (Kirsty
Mitc...
नदी का सागर से मिलन
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सागर से मिलने भागी आती नदी पहली बार देख रहा था, एक नदी का सागर से मिलना।
स्थान कारवार, नदी काली और अरब सागर। दोपहर के समय ऊपर से पड़ने वाली सूरज की
किरणे...
आखिर भारत सरकार किसके प्रति जवाबदेह है?
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*भारतीय संविधान को मानने वाले लोग बेहिचक कहेंगे कि निश्चय ही संसद के
प्रति।एकदम सही जवाब है। अमिताभ बच्चन सीटपर होते और आप उनके मुखातिब रहे होते
तो इस सव...
बयार परिवर्तन की
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बिहार की राजनीति में रैलियों का हमेशा से महत्व रहा है और अधिकांश रैलियों
में सत्ता+पैसा का घिनौना नाच एवं गरीबी का मजाक भी होता रहा. इस बार आया
"परिवर्तन र...
नपुंसक जातियां क्रांति नहीं किया करती
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हालात दिन प्रतिदिन बिगड़ते ही दिख रहे हैं, जनप्रतिनिधि हर पल निरंकुश नज़र आ
रहे हैं, सत्ताधारी निर्लज्ज से समझ आते हैं, विपक्ष गुमसुम सा दिखाई देता है,
जनत...
मकबरे के दोनों बुत एक दूसरे का चेहरा देखते सोये थे
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वो बहुत जोर से इस बात पर चौंका था कि मैंने कभी कोठा नहीं देखा था...किसी तरह
का चकला, कोई बाईजी का घर नहीं. मैं इस बात पर परेशान हुयी थी कि उसने क्यों
सोच...
नल दमयंती -4
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पहली, दूसरी एवं तीसरी कड़ी से आगे...
[image: A play based on the story of Nal and Damayanti]
*पंचम दृश्य *
(दमयंती स्वयंवर का महोत्सव। नृत्य गीतादि चल रहे...
रिश्तों के अवशेष
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कभी कभी
या शायद बहुधा
रिश्ते जलाए प्रेम पत्रों के अवशेष से रह जाते हैं
काले सलेटी इन अवशेषों के शब्द
अब भी खुदे रह जाते हैं जस के तस
कुछ वैसे ही जैसे स्मृति...
गांधी मैदान को ना ठगिये
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परिवार, परिवर्तन या पद। चाहिये क्या । पटना के गांधी मैदान में पटे पड़े
पोस्टर को देख कर हर किसी ने कहा परिवार। पोस्टर को पढ़ा तो हर किसी को लगा
बात तो परि...
जिजीविषा के आखिरी छोर पर
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काँच के प्याले में
आइस क्यूब्स के गिरने की आवाज़ आती है
जैसे तुम्हारा हेयर क्लिप
अंगुलियों से छिटक कर गिर पड़ता है आँगन पर।
और खुल जाता है, जूड़ा याद ...
1984 – ए रोड स्टोरी
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इस बार मई माह में गाँव जाना हुया एकदम अकेले. मार्च में चचेरी बहन के विवाह
पर देश-विदेश से इकट्ठा हुए कुनबे वालों की गहमागहमी के बाद, मेरे सबसे छोटे
चाचा ...
1984 – ए रोड स्टोरी
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इस बार मई माह में गाँव जाना हुया एकदम अकेले. मार्च में चचेरी बहन के विवाह
पर देश-विदेश से इकट्ठा हुए कुनबे वालों की गहमागहमी के बाद, मेरे सबसे छोटे
चाचा ...
1984 – ए रोड स्टोरी
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इस बार मई माह में गाँव जाना हुया एकदम अकेले. मार्च में चचेरी बहन के विवाह
पर देश-विदेश से इकट्ठा हुए कुनबे वालों की गहमागहमी के बाद, मेरे सबसे छोटे
चाचा ...
क्षणिकाएं !
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(१) *सुख और दुःख*
ऐसा वक्त कब आएगा
जब हम खुशी में
बचे रहेंगे सरल
और दर्द में अविकल
न खुशी में चहकेंगे और
न ही दुःख में होंगे विह्वल
क्या हमारे जीते ज...
कपड़े धोती हुई कवयित्री
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*अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के इस ठिकाने पर आज एक बार फिर पढ़ते हैं
पोलिश कवि अन्ना स्विर्सज़्यान्स्का ( १९०९ - १९८४ ) की एक और कविता ।**अन्ना
स्वि...
मेरी मां खटारा नहीं है आदि( लप्रेक)
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आदि, तू इतना अपसेट क्यों हो रहा है यार ? एक संडे हमलोग नहीं मिलते तो इससे
पहाड़ तो नहीं टूट जाता न और फिर आगे हम इतने संडे साथ होंगे कि तुझे याद भी
नहीं रह...
मातृ दिवस पर कुछ हाइकु .........
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*मातृ दिवस पर कुछ हाइकु .........*
*(१)*
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संग है रोई
हर दर्द मेरे माँ
दूजा न कोई*
*
(२)*
*
माँ की ममता
त्याग,तप,क्षमा की *
* रब्ब सी मूरत *
*
(३)*
*
इतनी...
डेढ़ इश्क़!
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तभी था ठीक,जब वो मौसमों को दिल में रखता था
डर सा लगता था ,जब कभी वो बारिश को बकता था !!
सुर्ख़ करके हरेक शाम, जो वो भरता था अपना ज़ाम
ख़्वाबों का नशेड़ी था ,...
चंद ख्वाहिशों में लिपटे फूल…
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[image: 303035_425333964229037_1430586196_n]तुम्हारे प्यार से भेजे हुए पहले
फूल जो अब सूख गये हैं, उनकी भीनी भीनी खुश्बू में डूबकर ये सोचती हूँ की क्या
क...
रामनुजम ने स्वयं अपना आविष्कार किया
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इस चिट्ठी में, कुछ चर्चा हार्डी और रामानुजन के बारे में और उनमें क्यों
इतनी पटती थी है।
रामनुजन और हार्डी एक दूसरे के विपरीत थे। रामुनजन ईश्वरवादी थे। उन...
ईश्वर सब देख रहा है!
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*व्यंग्य*
पता नहीं कौन लोग रहें होंगे, कैसे लोग रहे होंगे जिन्होंने ईश्वर को बनाया।
और बनाए रखने के लिए तरह-तरह की स्थापनाएं और दलीलें खड़ी कीं। मैं जब कभ...
छूटे हुए गाँव
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बचपन में जाता हूँ तो सबसे पहले गाँव याद आता है . जिसके स्कूल में मैं पहले
दो दर्ज़ा पढ़ा . जहाँ मास्टर जी 20 तक पहाड़े, 100 तक गिनती और किताब में लिखी
कविता...
समलैंगिकता की चीड़फाड़
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लगभग डेढ़ वर्ष से मैं भारत भ्रमण पर हूँ। पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से
लेकर दक्षिण लगभग पूरा भारत नाप चूका हूँ। अपने इस भ्रमण के दौरान पुरे भारत
में मुझ...
नंदी हिल्स पर फ़तेह !!!
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पहले २४ घंटे तो बढ़िया बीते बेंगलुरू में | शनिवार का दिन था | सुशांत और उनके
रूम-मेट्स आज ऑफिस से जल्दी घर आ गए | प्लान था कि अगले दिन सुबह सुबह नंदी
हिल्स ...
प्रेमकथा में फिर से लौटती है रोशनी
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*[ संजय कुंदन की ४ नई कविताएं ]*
Fumihiro Ooga
*स्थगन के बाद*
अचानक जमा होने लगते हैं रंगीन बादल
दिखाई पड़ते हैं कुछ प्रवासी पक्षी पंख फैलाए
एक नया मौ...
आह ! हंगामेदार देश हमारा
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आह ! हंगामेदार देश हमारा
खुल गया मानो मुद्दों का पिटारा
उत्तर से दक्खन तक सब-हारा सब-हारा
संस्कारहीन युवा – सम दुश्शासन चरितर
कराहती रहीं बेटियां और शर्...
A Daughter remembers : ' Jyoti ~ Kalash '
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*ॐ *
*A Daughter remembers : **' Jyoti ~ Kalash '*
*
*
* Like a child that climbs out of the womb of Earth and
stands in awe witnessing ...
जवाबों की दुनिया में सवाल
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भले आदमी तुम कहाँ पर मिलोगे, प्रफुल्लित खिलोगे भले आदमी
दीन दुनिया की रफ्तार में खर्च बचते, कहाँ तक रहोगे भले आदमी
अल्टे सल्टे पुलिंदों की ख़ुफ़िया गुफ़ाए...
केन, कंप्यूटर और आनेवाली दुनिया..
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“When I was born in 1950, no one had a home computer. The average computer
then was about the size of your living room. This was one reason people
didn’t...
लगभग जीवन : परमेन्द्र सिंह
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अधिकांश लोग जी रहे हैं
तीखा जीवन लगभग व्यंग्य
अधिकांश बँट गए से बचे
लगभग जीवन में
अधिकांश पर बैठी मृत्यु
लगभग स्वतंत्र अधिकांश लोगों में
स्वतंत्र होने...
इस रात की सुबह नहीं...
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बात इसी सर्दी के दिनों की है जब रात का पारा जीरो के नीचे चला गया था. रजाई
भी उस रात बहुत कारगर नहीं था. ठंड ने कई बार जगाया. सिहरन भरी रात उसकी याद
बार-ब...
टीवी के लिए गांव की छूटी हुई भौजाई है रेल बजट
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पिछले तीन-चार दिनों से रेल बजट के नाम पर चैनल के एंकरों और रिपोर्टरों
द्वारा दालमखनी बनाने का काम शुरु हो गया है जिसे कि दिल्ली में मां की दाल
कहते हैं. ज...
समकालीन कविता
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*संकट हिंदी कविता नहीं असल में हिंदी आलोचना का है***
मुंबई ये प्रकाशित पत्रिका चिंतनदिशा में पिछले कुछ अंकों से चल रही बहस को
आप यहां पढ़ते आए हैं. प...
लोकनाटकों की रंगभाषा
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*“ मुझे एक ऐसी भाषा की तलाश है,जो दृश्य हो,जो मंच की भाषा हो, ज्यादा
प्रत्यक्ष, ज्यादा जिला देने वाली और अपने प्रभावों में शब्दों...
जीवन चलने का नाम : बस इतना सा ही ख़्वाब है!
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*जीवन चलने का नाम*
*कल 2012 था और आज 2013 की नयी सुबह!*
वास्तविकता यह है कि इस एक वर्ष के बुढ़ाने में हम अधिक अनुभवप्रज्ञ हुए होंगे?
अधिक जानकारियों से ल...
फिर एक बार उफ़!!
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दिल्ली में हुए बलात्कार के बारेमे बहुतसे दोस्तों ने बहुत कुछ लिख दिया।टीवी
पे देखा।जनता लड़ झगड़ रही थी आपस में ...अक्सर लोग ऐसे में पुलिस को दोषी मानते
हैं....
अरे बाप रे! बंगाल टाइगर की आँखों में मेरा चेहरा..
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थियेटर में घुसने से पहले सर पर एडिडास की उलटी केप लगाए टिकट चेक करने वाले
लड़के ने जब प्लास्टिक का चश्मा थमाया तो जितनी उदासीनता से उसके हाथों ने
थमाया थ...
1989 की कवितायें - दो तिहाई ज़िन्दगी
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यह उन दिनों की कविता है जब नौकरी भी आठ घंटे करनी होती थी और मजदूरी के भी आठ
घंटे तय होते थे , शोषण था ज़रूर लेकिन इतना नहीं जितना कि आज है । कुछ
अजीबोगरीब ...
मेकिंग ऑफ़ अ व्यंगकार !!
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मेरा आजकल प्रेरित होने का टाइम चल रहा है| घूम-घूम के, छांट-छांट के, चुन-चुन
के प्रेरित हो रहे हैं| कुछ काम नहीं था तो एक व्यंगकार जी से २-४ छटांक
प्रेरणा क...
राइटर ब्लॉक से निजात मिल ही गई
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आज से दस बारह वर्ष पहले का समय था जब अखबार में यह सोच सोच कर लेख भेजा करते
थे कि हम गिनती के 40-45 लेख ही तो लिख पाएंगे ...इसलिए लेखों को इस तरह संभाल
कर ...
लोकपाल का लड्डू न सही जांच की जलेबी दे दो
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जंतर मंतर पर आज एक बार फिर सड़को पर तिरंगा लिए लोगों का हूजूम दिखा। सभी
अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है का नारा लगाए उस ओर चले जा रहे थे
जिस ओर अरव...
बिछड़े सभी बारी-बारी ..
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मेरे घर से तुमको कुछ सामान मिलेगा , दीवाने शायर का एक दीवान मिलेगा और एक
चीज़ मिलेगी..टूटा ख़ाली जाम ..फिल्म नमक हराम में रज़ा मुराद के आखि़री पलों
में ग...
मनुष्य, रोबोट और क्लोन
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इस ब्लॉग पर वर्तमान शृंखला लिखते समय मैं स्वत:स्फूर्त अंदाज में हूं। इस बार
लिखते समय पहले की भाँति कोई तैयारी नहीं कर रहा। कोई संदर्भ नहीं देख रहा,
कोई उद...
बदनाम बस्ती की जिद्दी लड़की की एक और जिद
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देसी चीयर्स लीडर के ठुमके
गीताश्री
बदनाम बस्ती की सबसे जिद्दी लडक़ी इन दिनों बेहद चिंतित और गुस्से में है। उसे बेचैन कर दिया है इस खबर ने कि उस बस्ती की लड़...
नुसरत बाबा की एक बेजोड़ बंदिश
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नुसरत बाबा जो करते हैं सो अनूठा ही होता है.
ये कंपोज़िशन सुनिये तो लगता है जैसे सुरों का
एक दहकता अंगार हमारे बीच मौजूद है.
उस्तादजी ने क़व्वाली विधा में काम ...
योगासन से बीमार होते हैं ?
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मैं पिछले आठ - दस साल से योगासन करता आ रहा हूँ |जब मैंने १९५० से निःशुल्क
योगासन सिखाने वाले एक प्रतिष्ठित प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला लिया तो मुझसे
मेरी ब...
और 'अना' अना न रही
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क्या बताऊँ मैं 'मीत' कितना उसे चाहा था
सिवा हयात से अपने, उसे सराहा था
और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थ...
दूर छिपे उन दिनों का सपना
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(आज लगभग दस सालों बाद लिखी गई कवितानुमा कोई चीज़)
अखबार के पहले पन्ने पर रोते-बिलखते लोग
बम फटने से मरे लोगों के परिजन
बसे रहते हैं दिन भर मन में कहीं
अंधेरी ...
ब्लॉगर अब बिल्कुल ठीक काम कर रहा है
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अगर आप ब्लॉगर (ब्लॉगस्पॉट) प्लेटफॉर्म पर ब्लॉगिंग करते हैं, तो 12 व 13 मई
2011 के बीच इस संदेश से आप भी रूबरू हुए होंगे।
Blogger is currently unavailable....
आपने महुआ घटवारिन की कथा तो सुनी ही होगी !
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11 अप्रैल को हिन्दी के प्रख्यात कथाशिल्पी *फणीश्वर नाथ रेणु** *की
पुण्यतिथि थी। उस दिन चाहता था कि उनकी स्मृति से जुड़ी कुछ बातें खेती-बाड़ीमें भी सह...
भेड़ियों के देश में
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इसे पढ़ते पढ़ते सोचकर देखिये, आप एक दिन पास के ही सुंदर से जंगल में भ्रमण
का विचार बनाते हैं और निकल पड़ते हैं अकेले ही। खुबसूरत वादियों, झरनों,
पेड़ों से ...
यहाँ हर सिम्त रिश्ते हैं जो अब मुश्किल निभाना है
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बहुत आसाँ है रो देना, बहुत मुश्किल हँसाना है
कोई बिन बात हँस दे-लोग कहते हैं "दिवाना है"
हमारी ख़ुशमिज़ाजी पे तुनक-अंदाज़ वो उनका-
"तुम्हें क्यों हर किसी को हम...
वर्य, वरीय
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[image: It's Okay To Be Different]वेदों और शास्त्रों में पाए गए वर्य तथा
वरीय शब्द लैटिन भाषा के शब्द variorum से उद्भूत हैं जिसका अर्थ 'भिन्न' है
न कि '...
‘तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम’
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- राजकुमार केसवानी* *
इस दुनिया के दस्तूर इस क़दर उलझे हुए हैं कि मैं ख़ुद को सुलझाने में अक्सर
नाकाम हो जाता हूं. पता नहीं क्या सही है और क्या ग़लत. ऐसे...
चित्र पहेली का हल: बेऑबॉब
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क्या आपने किसी ऐसे वृक्ष के बारे में सुना है या पढ़ा है जिसके तने में हजारों
लीटर पानी भरा रहता हो? या जिसके तने में घर, दुकान, अस्पताल या अस्थायी जेल
तक बन...