कौन गुज़रा था अभी..
-
रात के बेहूदा ख्वाबों से बच कर सुबह आँख खुलने के बाद जी कहीं लगता ही नहीं.
देखता हूँ कि ड्राफ्ट में बहुत सारे शब्दों का जमावड़ा हो गया है. कुछ भी
तरती...
कश्मीर को खोने की ख्वाहिश
-
श्रीनगर स्थित कश्मीर विश्वविद्यालय का सभागार। एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के
उद्घाटन सत्र के लिए देश-दुनिया से पधारे अर्थशास्त्री व शिक्षाविद मौजूद हैं।
विश्व...
अंधविश्वास की तिजारत और राजनीति
-
-सनल इडामारूकू
जहाँ एक ओर समेले इडामरक्कू नामक तार्कितावादी, “धार्मिक विश्वासों को चोट
पहॅुचाने“ के आरोप में कानूनी कार्यवाही का सामना कर रहे हंै वहीं दूसर...
सिंगरौली के संघर्ष का सफर
-
यह रास्ता जंगल की तरफ जाता जरुर है लेकिन जंगल का मतलब सिर्फ जानवर नहीं
होता। जानवर तो आपके आधुनिक शहर में हैं, जहां ताकत का एहसास होता है। जो
ताकतवर है उ...
जरूरी सूचना
-
ऐसा है कि दो महीने होने वाले हैं मुझे घर से बाहर निकले हुए। कभी अप्रैल के
शुरू में जोशीमठ गया था, अब जून आने वाला है। जितनी भी यात्रा कथाएं थीं, सब
खत्म हो...
चले दिल्ली : शेख चिल्ली
-
*इस समय गर्मी अपने चरम पर है। सही बात है गर्मी अपने चरम पर है तभी तो मौसम
खूब गरम है। ऐसे में कहीं जाना मानो वही सब कुछ जिसे शायरी में कहा गया है 'आग
का दर...
1988 की कवितायें
-
1988 में कवितायें कम लिखीं । तीन प्रेम कवितायें जो 1987 में लिखी थीं
उन्हें फाइनल किया और उसके अलावा " नीन्द न आने की स्थिति में लिखी कुछ
कवितायें " चलिये...
मेरे हिस्से के रावत जी
-
[image: bhagwat-rawat1]
जब से खबर मिली है, भगवत रावत नहीं रहे, उनकी छवि रह रह के आंखों के सामने तैर
जाती है. जिंदादिल, आत्मीय और मुस्कुराता चेहरा.
शाय...
पूरा पूरा कुछ नहीं...अधूरी अधूरी सब कुछ.
-
आप १४० पर हड़बड़ में नहीं पहुँच सकते.
मैं गाड़ी की स्पीड की बात कर रही हूँ...१४० किलोमीटर प्रति घंटा.
ऐसा नहीं होगा कि आप एक्सीलेरेटर को पूरा नीचे तक दबा द...
ना खुदाने सताया...
-
कभी,कभी ज़िंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं,जहाँ केवल सवाल ही सवाल होते हैं! हर
तरफ चौराहे...जिन्हें अपना माना,जान से ज्यादा प्यार किया...पता ...
लोकतंत्र में लोकतान्त्रिक शक्तिविहीन जनता
-
हम विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के निवासी हैं, यह बात हम सभी को गौरवान्वित
करती है, अब कितना करती है और किस तरह से करती है, यह और बात है। बड़ी-बड़ी
किताब...
ईमानदारी अब डराती है !
-
ईमानदारी
अब कीमत चुकाती है ,
बीच सड़क पर
क़त्ल होती है वह
व्यवस्था आँख मूँद कर चली जाती है !
ईमानदारी
अब सबको डराती है,
दिन के उजाले में भी
स्याह*अँधेरा ल...
बहें, नदी सा
-
बहने को तो हवा भी बहती है पर दिखती नहीं, जल का बहना दिखता है। न जाने कितने
विचार मन में बहते हैं पर दिखते नहीं, शब्दों का बहना दिखता है। कल्पना हवा की
तरह...
सामान्य ज्ञान
-
आज एक वाकया हो गया. वैसे घर में तो तीन स्नानगृह/शौचालय है, मुझे ऊपर की
मंजिल में एकदम बड़े वाले में जाना अच्छा लगता है. एक तसल्ली होती है क्योंकि
मुंबई वाल...
सबद सहचर : १ : अजित वडनेरकर
-
*[ साहित्य और विचार को लेकर बहुत सारा काम सीधे इस माध्यम में हो रहा है। सबद
उन सब से अपना स्वाभाविक जुड़ाव महसूस करता है और उनका सहचर बनने का आकांक्षी
भी ...
क्रिकेट का दीवानापन - खेलों को पनपने नहीं दे रहा है
-
इस चिट्ठी में नैनीताल में हॉकी मैच और क्रकेट की दीवनगी के कारण अन्य खेलों
के दुर्भाग्य की चर्चा है।
[image: Hockey-All India Traders Cup -2009]यह चित्र आनन्...
ब्या-काज के वे दिन
-
हिन्दी का रचनात्मक साहित्य ज्यादातर आपसी संबंधों या एक हद तक राजनैतिक
आर्थिक ताने बाने के इर्द गिर्द ही सामाजिक सवालों का लेखा जोखा संजाये है।
विज्ञान, खे...
अनगढ़ कविता के, तलघर में..
-
*मैं एक कविता बनाने बैठता, और जल्दी ही ज़ाहिर होने लगता कि छिटकती बनती हुई
जो भी वह है, वह तो कतई नहीं जिसे पा लेने की पुलक में मैं उमगता कल्पना की
रेल चढ...
बारह बरस!
-
... तो जब शाम होगी, थकन ढलान होगी
खोलूँगा वह पीला पड़ा कागज।
जिसे कहती थी तुम पहला प्रेमपत्र
जिसके नीचे लिखा अनाम सादर।
बारह बरस पुरानी स्कॉच
जिसकी रंग...
Translations of my poems-02
-
6. तस्सव्वुर
जमीन पर नहीं
हवा में नहीं हूँ
पानी से पुरानी यारी है
जो भी है
उसकी सतह पर चित्रकारी है
रोशनी का है उधार
सूरज, चाँद, तारे साहूकार...
आओ मित्रों परिकल्पना सम्मान-2011 का बहिष्कार करें
-
ब्लॉग जगत के प्रिय बंधुओ प्रणाम,
बहुत दिनों बाद अपने ब्लॉगर पर लॉग इन किया तो पाया की इनकी तो सूरते हाल ही
बदल गयी है. अपने ब्लॉग पर लिख पाना भी भारी हो रहा...
मनोहर पोथी बेचते बच्चे (कविता)
-
*हाल की एक कविता जिसके कुछ भाव आजादी कविता से मिलते हैं... *
दस रुपये में चार किताबें
बेच रहे थे बच्चे
उस दिन
रेलगाड़ी में
जिनकी उम्र दस साल भी नहीं थी।
...
मां! तुझे सलाम...
-
*-फ़िरदौस ख़ान *
*क़दमों को मां के इश्क़ ने सर पे उठा लिया*
*साअत सईद दोश पे फ़िरदौस आ गई...*
ईश्वर ने जब कायनात की तामीर कर इंसान को ज़मीं पर बसाने का तसव...
मोहब्बत का फूल .......
-
*पिछले दिनों जो इमरोज़ जी पर पोस्ट लिखी , वह यहाँ के दैनिक समाचार पत्र में
भी छपी ...मैंने उसकी कटिंग इमरोज़ जी को भेजी थी .....जवाब में उन्होंने
तुरं...
बदनाम बस्ती की जिद्दी लड़की की एक और जिद
-
देसी चीयर्स लीडर के ठुमके
गीताश्री
बदनाम बस्ती की सबसे जिद्दी लडक़ी इन दिनों बेहद चिंतित और गुस्से में है। उसे बेचैन कर दिया है इस खबर ने कि उस बस्ती की लड़...
हवा में तैरती हुई हरी नदी
-
प्राचीन संसार के सात अजूबों में से एक अजूबा था *बेबीलोन* के झूलते बाग. यह
सचमुच के बाग थे या मिथक यह कहना कठिन है क्योंकि इन बागों के बारे में कुछ
प्राचीन...
विकी डोनर : पटाखा फिल्लम!!!!
-
याद है सत्ते पे सत्ता का वो सीन जिसमे अमिताभ बच्चन “*दारू पीने से साला लीवर
खराब हो जाता है*" कहते सुने जाते हैं | सीन में उनके साथ अमज़द खान भी हैं |
दर...
अनवारे इस्लाम* की ग़ज़लें
-
*1.*
सगे भाई हैं, उनमें प्यार भी है
मगर आँगन में इक दीवार भी है
बहुत मासूम है चेहरा किसी का
नहीं लगता कि दुनियादार भी है
बहुत-सी ख़ूबियाँ हैं उसमें लेकिन
क...
नुसरत बाबा की एक बेजोड़ बंदिश
-
नुसरत बाबा जो करते हैं सो अनूठा ही होता है.
ये कंपोज़िशन सुनिये तो लगता है जैसे सुरों का
एक दहकता अंगार हमारे बीच मौजूद है.
उस्तादजी ने क़व्वाली विधा में काम ...
कोटि कोटि परनाम चल गयी दूकान
-
*इन दिनों काफी एनर्जाइस्ड महसूस कर रहा हूं. अरे बसंत-वसंत का चक्कर या
व्रत का कमाल नहीं है. लेकिन बात कुछ खास है कि रात बारह बजे के आसपास
अचानक मूड फ्रेश हो...
और वह मरने कि हद तक जिन्दा रहा!!
-
दो लोग अनिश्चितता की स्थिति में बैठे हुए थे.. एक ही बेंच पर.. दोनों अपने
कोने को पकड़ कर, जैसे किसी समानांतर रेखा कि ही तरह कभी ना मिलने वाले.. यह
एक लंबी...
जिंदगी और बता तेरा इरादा क्या है?
-
*सुख* हाथों की पहुँच से दूर नहीं हुआ करता था... दाल में नमक की तरह सुख का
स्वाद दिन में कम से कम एक- दो बार तो आ ही जाता... जिंदगी के रंगों से भरपूर
.. स...
गन्ना रस क्यों नहीं पीता मैं!?
-
वैसे तो मेरे शहर, भिलाई में जनवरी का माह बीतते बीतते गन्ना रस के अस्थाई
ठिकाने सज जाते हैं लेकिन इस बार कुछ देर हुई इनके दिखने में। होली के दो दिन
पहले ऑफ़ि...
गन्ना रस क्यों नहीं पीता मैं!?
-
वैसे तो मेरे शहर, भिलाई में जनवरी का माह बीतते बीतते गन्ना रस के अस्थाई
ठिकाने सज जाते हैं लेकिन इस बार कुछ देर हुई इनके दिखने में। होली के दो दिन
पहले ऑफ़ि...
गन्ना रस क्यों नहीं पीता मैं!?
-
वैसे तो मेरे शहर, भिलाई में जनवरी का माह बीतते बीतते गन्ना रस के अस्थाई
ठिकाने सज जाते हैं लेकिन इस बार कुछ देर हुई इनके दिखने में। होली के दो दिन
पहले ऑफ़ि...
दस्तक..
-
लफ़्ज़ों ने दिल पे दस्तक दी
कि अरसे से कुछ लिखा नहीं
यूँ तो सोच रोज़ सुलगी
धुआं कहीं दिखा नहीं॥
मैं रोज़ ख्यालों के दर पर
जाकर भी लौट आता था
जाने वो अनजाना सा...
तुम बेसहारा हो तो ...
-
कल बाद दोपहर मैं अंबाला छावनी में एक टी-स्टाल पर चाय की चुस्कियां ले रहा था
.... उसी स्टाल पर किसी मोबाइल पर यह सुंदर सा गीत भी बज रहा था, बहुत दिनों
बाद स...
जो गुरु बसै बनारसी, सीष समुन्दर तीर
-
रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार, प्रारम्भ में ही ज्ञान शिक्षा का आश्रम
स्थापित करने के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है। शिक्षक तो आवेदन करते ही लाइन
लगा देते है...
धर्म की भूमिका पर एक नजर
-
*विष्णु नागर- *
जब भी समाज में बुनियादी परिवर्तन की बात आई, तब इससे धर्म को अछूता छोड़ा
गया। धर्म और सामाजिक परिवर्तन में अंतर्विरोध है। इसे रेखांकित करने ...
शंकराचार्य का रचनाकर्म : एक समीक्षा
-
( इस ब्लॉग की सदस्या लवली गोस्वामी का यह महत्त्वपूर्ण आलेख गर्भनाल पत्रिका
के दिसंबर अंक में ‘शंकराचार्य का रचनाकर्म : विज्ञानवादी दृष्टि से एक
समीक्षा’’ श...
एक ब्लागर मीट जो महान होते-होते बची !
-
समय - शिव कुमार मिश्र जी का कार्यालय, कोलकाता (समय के साथ कोलकाता इसलिए कि
कोलकाता समय और काल से परे हो चुका है)
स्थान - १५ नवम्बर, २०११ - करीब ८ बजे ( स्था...
बात सच्ची हो तो चाहे जिस ज़बां में बोलिये
-
स्कूल के दिनों में समूह प्रार्थना करते समय हमारे कुछ मुसलमान सहपाठी पंक्ति
में शामिल तो होते थे, पर मौन रहते थे और उनके हाथों की मुद्रा भी विश्राम में
रहती...
रिसेशन– नॉट अ मनोहर कहानी
-
[image: 2681452360]
*१*
कई दिनो से वह बहुत खुश थी। आँखो की चमक काफ़ी बढ गयी थी, मुस्कराहटें मीलों
जितनी चौडी हो गयीं थीं। एक हफ़्ते बाद उसके बच्चे इंडि...
अपनी इच्छाओं की महक जिंदा रखा करो जान
-
-> रेलवे ट्रैक को चीरकर धड़धडाती हुई जाती रेलें. रिमझिम रिमझिम होती बारिश.
और छतरीनुमा प्लेटफोर्म की बैंच पर बैठा मैं. कितना हल्का, कितनी राहत. देखा
जाए तो...
योगासन से बीमार होते हैं ?
-
मैं पिछले आठ - दस साल से योगासन करता आ रहा हूँ |जब मैंने १९५० से निःशुल्क
योगासन सिखाने वाले एक प्रतिष्ठित प्रशिक्षण केंद्र में दाखिला लिया तो मुझसे
मेरी ब...
जि.. जी.. विषा
-
[.......]
जो ग़म पूछें उन्हीं से हाल, वो कुछ यूं बताए हैं.
जहां तुम थोक में मिलते, वहीं से ले के आए है.
बलाएं भी बिरादर इस तरह, संग राह है प्यारे,
पनाहों ...
और 'अना' अना न रही
-
क्या बताऊँ मैं 'मीत' कितना उसे चाहा था
सिवा हयात से अपने, उसे सराहा था
और तो क्या था मेरी ज़ात का रिश्ता तुझ से
बस मेरी रूह कहीं तुझ में जा के मिलती थ...
दूर छिपे उन दिनों का सपना
-
(आज लगभग दस सालों बाद लिखी गई कवितानुमा कोई चीज़)
अखबार के पहले पन्ने पर रोते-बिलखते लोग
बम फटने से मरे लोगों के परिजन
बसे रहते हैं दिन भर मन में कहीं
अंधेरी ...
ब्लॉगर अब बिल्कुल ठीक काम कर रहा है
-
अगर आप ब्लॉगर (ब्लॉगस्पॉट) प्लेटफॉर्म पर ब्लॉगिंग करते हैं, तो 12 व 13 मई
2011 के बीच इस संदेश से आप भी रूबरू हुए होंगे।
Blogger is currently unavailable....
आपने महुआ घटवारिन की कथा तो सुनी ही होगी !
-
11 अप्रैल को हिन्दी के प्रख्यात कथाशिल्पी *फणीश्वर नाथ रेणु** *की
पुण्यतिथि थी। उस दिन चाहता था कि उनकी स्मृति से जुड़ी कुछ बातें खेती-बाड़ीमें भी स...
भेड़ियों के देश में
-
इसे पढ़ते पढ़ते सोचकर देखिये, आप एक दिन पास के ही सुंदर से जंगल में भ्रमण
का विचार बनाते हैं और निकल पड़ते हैं अकेले ही। खुबसूरत वादियों, झरनों,
पेड़ों से ...
यहाँ हर सिम्त रिश्ते हैं जो अब मुश्किल निभाना है
-
बहुत आसाँ है रो देना, बहुत मुश्किल हँसाना है
कोई बिन बात हँस दे-लोग कहते हैं "दिवाना है"
हमारी ख़ुशमिज़ाजी पे तुनक-अंदाज़ वो उनका-
"तुम्हें क्यों हर किसी को हम...
अकेला घर करीम का.....
-
वो देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक है। उसकी गिनती ख़ुद से शुरू होती है और
वहीं ख़त्म भी हो जाती है। पूरे गांव में अकेला मुसलमान, करीमबख़्श। उम्र
पिचासी पा...
वर्य, वरीय
-
[image: It's Okay To Be Different]वेदों और शास्त्रों में पाए गए वर्य तथा
वरीय शब्द लैटिन भाषा के शब्द variorum से उद्भूत हैं जिसका अर्थ 'भिन्न' है
न कि '...
‘तुम्हारे शहर में आए हैं हम, साहिर कहां हो तुम’
-
- राजकुमार केसवानी* *
इस दुनिया के दस्तूर इस क़दर उलझे हुए हैं कि मैं ख़ुद को सुलझाने में अक्सर
नाकाम हो जाता हूं. पता नहीं क्या सही है और क्या ग़लत. ऐसे...
मक्काई का हलवा: एक अनाड़ी रसोईये की स्वीट रेसेपी
-
अनाड़ी इसलिए लिखा कि आप सब मेरे पाक कला ज्ञान से अच्छी तरह से वाकिफ़ है। मेरे
बनाए खाने का क्या-क्या हाल हुआ। लेकिन इन गर्मियों की छुट्टियों में लगन से
खाना ...